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Thursday, April 18, 2024

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कालका की सुंदर वादियों में एक दो दिवसीय ओशो कैंप का आयोजन किया गया ।

कालका की सुंदर वादियों में एक दो दिवसीय ओशो कैंप का आयोजन किया गया ।

जिसका नाम माई वैलेंटाइन भगवान रखा गया

कालका प्रदेश एजेण्डा न्यूज़ रविंद्र चौहान

कालका की सुंदर वादियों में द डिवाइन वंस इन नेचर रिजार्ट में एक दो दिवसीय ओशो कैंप का आयोजन किया गया । जिसका नाम माई वैलेंटाइन भगवान रखा गया। शिविर का संचालन पंजाब से पधारे स्वामी ध्यान सुमित द्वारा किया गया । शिविर का आयोजन स्वामी आनंद परिवर्तन ने किया । शिविर में हरियाणा और पंजाब के लगभग 20 मित्रों ने भाग लिया । पहले दिन के शिविर में संचालक स्वामी ध्यान सुमित ने विभिन्न ध्यान पद्धतियों से संन्यासियों का उत्साह बढ़ाया और उनको ध्यान की नई-नई विधियों से अवगत करवाया। दूसरे दिन सुबह डायनेमिक, ओम मेडिटेशन रिबूटिंग योरसेल्फ सुमित कहीं ध्यान पद्धतियों से सन्यासियों का खूब उत्साह वर्धन किया। कुल मिलाकर शिविर में पधारे सभी संन्यासियों ने ध्यान का खूब आनंद लिया। दोपहर को स्विमिंग पूल में भी एक ध्यान करवाया गया।

वसंत उत्सव का प्रतीक है।

_स्वामी ध्यान सुमित ने बताया कि.फूल खिलते हैं, पक्षी गीत गाते हैं, सब हरा हो जाता है, सब भरा हो जाता है। जैसे बाहर वसंत है, ऐसे ही भीतर भी वसंत घटता है। और जैसे बाहर पतझर है ऐसे ही भीतर भी पतझर है। इतना ही फर्क है कि बाहर का पतझर और वसंत तो एक नियति के क्रम से चलते हैं,श्रृंखलाबद्ध, वर्तुलाकार घूमते हैं, भीतर का पतझर और वसंत नियतिबद्ध नहीं है। तुम स्वतंत्र हो, चाहे पतझर हो जाओ, चाहे वसंत हो जाओ। इतनी स्वतंत्रता चेतना की है। इतनी गरिमा और महिमा चेतना की है।_
_लेकिन दुर्भाग्य है कि अधिक लोग पतझर होना पसंद करते हैं। पतझर का कुछ लाभ होगा, जरूर पतझर से कुछ मिलता होगा अन्यथा इतने लोग भूल न करते! पतझर का एक लाभ है,बस एक ही लाभ है, शेष सब लाभ उससे ही पैदा होते मालूम होते हैं। पतझर है तो अहंकार बच सकता है। दुख में अहंकार बचता है दुख अहंकार का भोजन है। इसलिए लोग दुखी होना पसंद करते हैं। कहें लाख कि हमें सुखी होना है, सुख की कोशिश में भी दुखी ही होते हैं। सुख की तलाश में ही और-और नये दुख खोज लाते हैं। निकलते तो सुख की ही यात्रा पर हैं, लेकिन पहुंचते दुख की मंजिल पर हैं। कहते कुछ हैं लेकिन होता कुछ है। और जो होता है, वह अकारण नहीं होता। भीतर गहन अचेतन में उसी की आकांक्षा है।_
_ऊपर-ऊपर है सुख की बात, भीतर-भीतर हम दुख को खोज रहे हैं। क्योंकि दुख के बिना हम बच न सकेंगे। सुख की बाढ़ आएगी तो हम तो कूड़े-करकट की भांति बह जाएंगे। पतझर में अहंकार टिक सकता है। न पत्ते हैं, न फूल हैं, न पक्षी हैं, न गीत हैं, सूखा-साखा वृक्ष खड़ा है, लेकिन टिक सकता है? और वसंत आए कि गए तुम! वसंत आता ही तब है जब तुम चले जाओ। तुम खाली जगह करो तो वसंत आता है। तुम मिटो तो फूल खिलते हैं। तुम न हो जाओ तो तुम्हारे भीतर गीतों के झरने फूटते हैं।_
_और कुछ चढ़ाना नहीं है परमात्मा के चरणों में,और हम चढ़ाएंगे भी क्या? और हमारे पास है भी क्या? अपने को ही चढ़ा सकते हैं। इस अहंकार को ही चढ़ा दो, इस अस्मिता को ही चढ़ा दो, इस मैं को ही सूली दे दो और पिया की सेज मिल जाएगी। सूली ऊपर सेज पिया की। किस सूली के ऊपर है पिया की सेज? यह अहंकार सूली चढ़ जाए। इधर गर्दन कटी अहंकार की कि उधर प्रभात हुई।_
_और जैसे ही अहंकार जाता है, उसके साथ ही आश्चर्यजनक रूप से सारी चिंताएं, सारी व्यथाएं, सारी विपदाएं, सारे संताप चले जाते हैं। वही ऊर्जा जो संताप बनती थी, वसंत बन जाती है। वही ऊर्जा जो तुम्हारे भीतर दुख के कांटे उगाती थी, फूलों में बदल जाती है। ऊर्जा तो एक ही है, जो चाहो बना लो। निर्णय तुम्हारा है। हकदार तुम हो। जो पतझर में जीने का निर्णय लिया है, उसे मैं संसारी कहता हूं और जिसने वसंत में जीने का निर्णय लिया है, उसे मैं संन्यासी कहता हूं।_

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